Mukesh Chhajer
(from the book)प्रभु की माया, शीतल छायायदि याद रहे, यह खेल नयायदि उलझ गए, यदि भूल गएहोगा जन्म-जन्म फिर पछतावा जब उभरे मन में कोई लालचलाभ-हानि उठते ऊपरजब स्वार्थ पकड़ता है कसकरक्या याद रहेगा, यह खेल एकठोकर भी कभी तुम खाओगेखुशियाँ कभी मनाओगेमान, प्रतिष्ठा, दौलत भीकितनी ही बार तुम पाओगेदुख-सुख के दौर भी आयेंगे चिंतायें कभी सतायेंगीचढ़ते सूरज में भटकोगेक्या याद ये तुम रख पाओगेयह खेल नया, यह खेल नयाप्रभु की माया, शीतल छाया